Sunday, September 13, 2009

बलातकार के आरोप में पत्रकार गिरफ्तार

कोलकाता। एक महिला से बलातकार के आरोप में एक पत्रकार को एक अन्य व्यक्ति के साथ गिरफ्तार किया गया।
पुलिस ने बताया कि साउथ चाइना मार्निंग पोस्ट के लिए काम करने वाले पत्रकार एसएनएम आब्दी को उसके मित्र सैफुल इस्लाम के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। उसे बीती रात अपने न्यू अलीपुर स्थित आवास में एक महिला से बलातकार के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
पुलिस ने बताया कि 29 वर्षीय महिला ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि आब्दी ने नौकरी के लिए साक्षातकार के सिलसिले में उसे उसके घर पर आने को कहा, लेकिन जब वह उसके घर गई तो उसने सैफुल के साथ मिलकर उसके साथ बलातकार किया।
उन्होंने बताया कि आब्दी को महिला द्वारा दर्ज प्राथमिकी के आधार पर उसके आवास से गिरफ्तार किया गया था।

Saturday, September 12, 2009

Russia denies Arctic Sea carried missiles to Iran

Moscow, Sept 8, Russia today vehemently denied that
a cargo ship whose supposed seizure by pirates sparked an
international mystery was carrying sophisticated Russian
anti-aircraft missiles bound for Iran.
A British newspaper reported at the weekend that the
Arctic Sea had been carrying a batch of S-300 missiles, as
conspiracy theories swirl over the ship's mysterious
disappearance and reappearance.
"Regarding the S-300s on board the Arctic Sea, this is
absolutely untrue," Russian Foreign Minister Sergei Lavrov
told reporters, when asked if the ship was secretly carrying
the advanced Russian-made missiles to Iran.
The Arctic Sea, a Maltese-flagged vessel with a Russian
crew, was hijacked near Sweden in late July before it was
recovered by the Russian navy in the Atlantic Ocean several
weeks later.
The seizure of the ship in one of Europe's busiest
shipping lanes, the huge international effort to recover it
and the detention of its crewmen after they returned to Russia
have prompted speculation that it held a secret cargo.
Officially the ship was carrying a load of timber worth
USD 1.7 million dollars from Finland to Algeria, but
speculation has raged that it was carrying weapons or even
nuclear materials.

Thursday, August 27, 2009

पार्टी तो गई

भाजपा तो टूट‍ती ही जा रही है और राजनाथ हैं कि अडे हुए हैं और कह रहे हैं कि वे पार्टी को बिखरने नहीं देंगे। शायद ये सब हवाई है। और अब तो यशवंत भी चुप्‍पी तोड बोल ही पडे कि कंधार मामले कि पार्टी के सभी बडे नेताओं को जानकारी थी। यशवंत सिन्हा ने कहा कि आडवाणी केबिनेट की मीटिंग में शामिल थे और हर फैसले के बारे में जानते थे। लेकिन भाजपा तो हीरो बनना चाहती थी और लोगों की साहानुभूति हासिल करना चाहती थी मगर कहते है कि घर का भेदी ही लंका को ढहा देता है। जसवंत का साथ देना सही भी था क्‍योंकि पार्टी में दोनों की लगभग वही हालत थी जो उन्‍हें अखरती थी। यशवंत ने खुलकर कहा कि किताब लिखना कोई अपराध नहीं है सभी अपनी बात कह सकते हैं लेकिन पार्टी को तो एक अदद मौके का इंताजार था कि बाहर का रास्‍ता दिखा दिया। शौरी भी बगावती हैं, कुलकर्णी भी राम- राम कह गए और क्‍या चाहते हैं राजनाथ ये वही जाने पर पार्टी तो गई।

Thursday, August 20, 2009

ये तो होना ही था

आखिर जसवंत सिंह ने मान ही लिया कि वे एक फौजी हैं न कि संघी। बात तो कायदे की है शायद भाजपा ऐसे ही तंतूओं से मिलकर बना है और संघी समझी जाने वाली विचारधारा का कोई खास स्‍‍थान यहां नहीं है। पार्टी से निकाले गए इस बडे नेता ने सही ही तो कहा है और पार्टी की हकीकत बयां की है अगर लोग भाजपा के भ्रम में फंसते हैं तो यह गलत होगा। कायदा तो ये भी है कि आरएसएस किसी को भी कुछ नहीं सिखा सकता। संघ में भी भ्रष्‍ट लोगों की कमी नहीं है। हिंदूवादी चश्‍में से देश को देखना दूनिया को देखना इनकी एक बीमारी है और इस बीमारी से सारा देश ही प्रभावित होता है। रामराज का दिवा ख्‍वाब दिखना इनका स्‍टंट ही तो है। समय कभी पीछे नहीं जाता और ये लोगा समय की धारा को पीछे ले जाने का ही काम करते हैं। पार्टी में आडवाणी को बाहर का रास्‍ता क्‍यों नहीं दिखाया गया जब वे जिन्‍ना का कसीदा पढे थे। सच तो ये है कि तब आडवाणी सही थे लेकिन सच तो संघ की बरदास्‍त से बाहर की चीज है वे सच का सामना नहीं कर सकते। यही तो रोना है। अपनी पुस्तक 'जिन्ना-भारत, विभाजन, आजादी' पर सफाई देते हुए जसवंत ने कहा भी है कि मैंने पुस्तक लिखकर पार्टी के सिद्धांतों का कोई उल्लंघन नहीं किया है। मैं किताब लिख रहा था यह सबको पता था और बहुत पहले पता था। आडवाणीजी की आत्मकथा 'मेरा देश, मेरी जिंदगी' का जिस दिन विमोचन हुआ था उसी दिन मैंने मंच से कहा था कि मैं जिन्ना पर पुस्तक लिख रहा हूं। लेकिन घुन तो पिस गया न।

Thursday, July 23, 2009

ये जिंदगी की हार नहीं

वो कहता है हार जाएगा तू
मेरा मानना है हार से ही तो जीत का रास्‍त मिलेगा
बस साहस करना है मुझे एक कदम उठाने का
लोग तो कहते हैं और कहते ही रहेंगे
जंगल घना हैं तो कल्‍लर उतना ही शानदार होगा
मुझे तो बस चलना है अपनी पीठ पर हिमालय लाद कर
लोग तो कहेंगे तो कहने दो पागल हैं वे
मैं वो युग हूं जो शुरु है
अंत किसने देखा है
यहां तो प्रारंभ की जरुरत है। और मैं वहीं कर रहा हूं।

Saturday, May 23, 2009

आप के लिए

इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई
मेरे दिल की दवा करे कोई
शर'अ-ओ-आईन पर मदार सही
ऐसे क़ातिल का क्या करे कोई
चाल जैसे कड़ी कमाँ का तीर
दिल में ऐसे के जा करे कोई
बात पर वाँ ज़ुबान कटती है
वो कहें और सुना करे कोई
बक रहा हूँ जुनूँ में क्या-क्या
कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई
न सुनो गर बुरा कहे कोई
न कहो गर बुरा करे कोई
रोक लो गर ग़लत चले कोई
बख़्श दो गर ग़लत करे कोई
कौन है जो नहीं है हाजतमंद
किसकी हाजत रवा करे कोई
क्या किया ख़िज्र ने सिकंदर से
अब किसे रहनुमा करे कोई
जब तवक़्क़ो ही उठ गयी "ग़ालिब"
क्यों किसी का गिला करे कोई।

Friday, May 1, 2009

यह एक शुरुआत है जिसका अंत कोई नहीं जानता. लेकिन शुरुआत का यही तरिका होता है. एक ईमानदार शुरुआत. आईये मेरे साथ बैठ कर कुछ सुकून की बातें हों, कुछ बगावत

जुल्फों से आ रही थी महक जाफरान की,
मत पूछ क्या घड़ी थी मेरे इम्तहान की।
आबरू से जा मिली है वो कागज की इक लकीर,
या खिंच गई है दोस्तों डोरी कमान की।
मेहनत खुलूस सादगी सच्चाई बांकापन,
इन जेवरों से सजती है लडक़ी किसान की।
बरसात के दिनों में कभी गांव जाके देख,
खुशबू अजीब होती है कच्चे मकान की।
महलों के साथ-साथ हो फुटपाथ का भी ख्याल,
तस्वीर एसे खींचीए हिंदोस्तान की।
मेरी गजल में अपनी ही धरती का हुस्न है,
क्यों बात करते हो उस आसमान की।



गुलाम हैं वे
गुलाम हैं वे जो डरते हैं
कमजोरों पतितों की खातिर
आवाज ऊंची करने से।
दास हैं वे जो नहीं चुनेंगे
घृणा, अपयश और निंदा के बीच
सही रास्ता लडऩे का
खामोशियों में सिमटने के बजाय
जरूरत है
सच्चाई के साथ सोचने की शुरुआत हो
गुलाम हैं वे जो नहीं करेंगे साहस
सबके बीच
सच का साथ देने का...